Showing posts with label Interviews. Show all posts
Showing posts with label Interviews. Show all posts

Wednesday, March 25, 2015

तेज़ाब, जिंदगी और उम्मीद : एक बातचीत रितु के साथ

जिंदगी में बहुत से मोड़ आते हैं, बहुत से लोगों से मुलाक़ात होती है- लेकिन कुछ मुलाक़ात खास होती है जिन्हें आप भूल नहीं सकते| रितु से मिलना वैसा ही था| रितु के चेहरे में एक मासूमियत थी- जिसे तेज़ाब भी छीन ना सका| सोलह साल की उम्र में तेज़ाब को सहना मुश्किल होता होगा| उम्र के किसी भी पड़ाव पर मुश्किल होगा| उसके साथ जीना और भी मुश्किल| रितु जीती है| मुश्किल होता है उसकी ना रुकने वाली हँसी को समझना, उसकी बेहद खूबसूरत मुस्कान को देखना- ये अद्भुत हैं| 

रितु ‘स्टॉप एसिड अटैक्स’ के साथ जुड़ी है| फिलहाल वो आगरा शहर में रह रही है| स्टॉप एसिड अटैक्स कैम्पेन ने आगरा में ‘शीरोज़ हैंगआउट’ नाम से एक कैफे की शुरुआत की है- जहाँ एसिड से लड़ने वाली लड़कियाँ सबकुछ संभालती हैं| ये बातचीत आगरा शहर में शीरोज़ हैंगआउट के अंदर ही हुई| क्योंकि मैं भी स्टॉप एसिड अटैक्स से जुड़ा हूँ, और रितु से एक-दो दफा पहले भी मिल चुका हूँ, इसलिए बहुत आराम से बातचीत कर पाया|

बिना काट-छांट के प्रस्तुत है पूरी बातचीत: 



निहाल: रितु, आपको बाइक चलाना बहुत पसंद है?

रितु: हाँ| मतलब एक दिन यहाँ कैफे में वो लोग आये थे- बुलेट ग्रुप बाइक वाले- बहुत सारे लोग| एक्टिवा तो चलाने मुझे आता ही है| मेरा मन था कि मैं बाइक सीखूंगी| गाड़ी बाद में सोचेंगे (हँसते हुए), गाड़ी की ज़रूरत अभी नहीं है| अच्छा लगता है बाइक चलाना|

निहाल: तो तुमने बुलेट चलाया?

रितु: नहीं... सिर्फ बैठ कर फोटो खिचवाया! (ज़ोर से हँसते हुए)

निहाल: अरे! ये तो बढ़िया है| और जितना मैं जानता हूँ, तुम रोहतक से हो...

रितु: हाँ|

निहाल: रोहतक शहर कैसा है? वहाँ के बारे में कुछ बताओ?

रितु: अच्छा है| सबको अपने अपने शहर अच्छे लगते हैं| एक बार अभिलाष भाई, कनिका दी, रूपा दी, मैं, हम सब गए थे...

निहाल: रोहतक गए थे?

रितु: हाँ| हम चार लोग गए थे| तो होता है ना- अपने शहर में आ गए, आगे-आगे चलते हैं...

निहाल: रोहतक की डॉन हो तुम!
मुस्कुराती रितु


रितु: (हँसते हुए) नहीं ऐसा नहीं है| मतलब, अब वहाँ के रास्ते पता हैं तो चल रहे हैं आगे-आगे| तो अभिलाष भाई बोलते हैं, “देखो, अपना शहर आ गया तो टशन आ गया|” (मुस्कुराती है)

अच्छा लगता है घर वापस जाकर| अभी मेरे केस में डिसिज़न आया तो, मैं गयी थी| मैंने दुबारा से खेलना ट्राई किया...

निहाल: तुम बास्केटबाल खेलती थी ना?

रितु: नहीं, वोलीबाल| तो दुबारा ट्राई किया- ढाई साल बाद, 26 दिसम्बर को- तो मेरे दोनों हाथ में स्वेल्लिंग आ गयी| मैं केस के सिलसिले में रोहतक गयी थी| काफी बीज़ी रही वहाँ| मीडिया वाले लगातार आते रहे| फिर दिल्ली में भी एक डॉक्टर पर एसिड अटैक हुआ था| उस कारण से भी दिल्ली में काफी काम था कैम्पेन के लिए|

निहाल: रोहतक में तुम वोलीबाल कहाँ खेलती थी? वहाँ कोई अकादमी है?

रितु: वहाँ एक गवर्नमेंट टीचर हैं, जो गेम खिलाते थे| तो एक ग्राउंड बना हुआ है| पहले स्कूल में था...

निहाल: कौन से स्कूल में पढ़ती थी?

रितु: सैनी हाई स्कूल...

हम बातचीत शीरोज हैंगआउट कैफे में कर रहे थे| तभी एक टूरिस्ट अचानक से आ जाता है| “वेयर इज द ए.टी.एम्?” वो मुझसे और रितु से पूछता है| वहाँ मौजूद हमारे दोस्त प्रणव उसको रास्ता बतलाते हैं| “राईट हैण्ड साइड... थोड़ा सा चलते हुए”, रितु भी रास्ता बतलाती है|
उनके जाने के बाद:

निहाल: तो कौन सा स्कूल था?

रितु: सैनी हाई स्कूल| वहाँ पर ग्राउंड था| 

निहाल: तो तुम रितु सैनी- इसलिए सैनी हाई स्कूल में पढ़ती थी! 

रितु: (हँसते हुए) अरे, ऐसा नहीं है| उससे पहले मैं एस.डी. हाई स्कूल में भी थी| कुछ टाइम तक वहाँ थी| लेकिन हम पाँच भाई-बहन थे| मम्मी-पापा भी प्राइवेट स्कूल में ज्यादा नहीं पढ़ा पाए| गवर्नमेंट भी अच्छा था| 

निहाल: हरयाणा के बारे में हम बहुत कुछ सुनते हैं, जैसे वहाँ लड़कियों को बहुत दिक्कत होती है| मुझे बहुत नहीं पता| तो रोहतक में भी ऐसा था क्या? वोलीबाल खेलना मुश्किल तो होता होगा? 

रितु: नहीं ऐसा नहीं है| बहुत सी लड़कियाँ खेलने जाती हैं| कोई नहीं रोकता| कौन से माँ-बाप अपने बच्चे को आगे बढ़ने से रोकेंगे?

निहाल: लेकिन हरयाणा के बारे में ऐसा सुनते हैं| हो सकता है कि गलत भी हो...

रितु: हाँ ये भी खबर आती है... मैं तो रोहतक डिस्ट्रिक्ट में रहती थी| गाँव टाइप नहीं है- मोस्टली शहर ही है| तो मैंने जहाँ तक देखा कोई नहीं रोकता| 

निहाल: अच्छा..

रितु: जो गाँव में लड़कियाँ हैं उनको सूट पहनना, घर का काम करो- ये सब होता है| मेरे मामा लोग हैं, तो वो मेरी बहनों को बाहर नहीं जाने देते| ये तो है| अब है मेरे मामा के उधर, कि मेरे बहन कि शादी है तो अपनी बेटियों को लेकर नहीं आयेंगे| 

निहाल: कहाँ लेकर नहीं आयेंगे?

रितु: मतलब शादी में लेकर नहीं आयेंगे हमारे घर| लड़के-लड़के सिर्फ आते हैं|

निहाल: तो ऐसी छोटी-छोटी चीज़ों में दिखता है ना ऐसा मर्द वाला समाज|

रितु: लेकिन हमारे पापा ऐसे नहीं हैं| हमें जहाँ जाना हो जा सकते हैं| हम दोनों बहनों को साथ ही लेकर चलते हैं|

निहाल: घर में कौन-कौन हैं तुम्हारे?

रितु: मम्मी हैं, पापा हैं, एक बहन, तीन भाई...

निहाल: और तुम...

रितु: हाँ और मैं| और भाभी हैं, उनके दो बच्चे भी हैं (हँसते हुए)| दूसरे वाले भाई की अभी जॉब लगी है गवर्नमेंट में|

निहाल: किस चीज़ में?

रितु: पता नहीं| वो लोग कुछ बोलते हैं| ज़मीन वाला कुछ है| मुझे पता नहीं| लेकिन जॉब लगा है, इतना पता है (ज़ोर से हँसते हुए)| उसका ट्रेनिंग चल रहा है|

मेरे लिए कुछ खाने का सामान आ जाता है, जो मैंने आर्डर कर रखा था|

रितु: उधर (एक खाली टेबल की तरफ इशारा करते हुए) चलकर खा लेते हैं| यहाँ (कैफे काउंटर पर) खायेंगे तो ठीक नहीं लगेगा|

निहाल: हाँ, चलो|

हम खाली टेबल पर पहुँचते हैं 

रितु: क्या बात कर रहे थे हम?

निहाल: मैं भी भूल गया! 

रितु: (हँसते हुए) कैसे इंटरव्यू लेते हो! 

निहाल: अरे, ऐसे ही बातचीत होती है ना| तो तुम अपने बड़े भईया के बारे में बता रही थी...

रितु: हाँ, उनकी शादी हो गयी| उनको दो बच्चे हैं- बेटी फोर इयर की है, बेटा टू इयर का है| हो गयी फाइव-सिक्स इयर उनकी शादी को| भाई बहुत छोटे थे जब उनका शादी हो गया- ट्वेंटी टू या ट्वेंटी वन के थे जब उनकी शादी हुई| 

निहाल: उधर शादी जल्दी हो जाती है?

रितु: पता नहीं| मेरा छोटा भाई भी है...
बातचीत के दौरान 

निहाल: उसकी भी हो रही है?

रितु: नहीं, वो ट्वेंटी फोर के हैं| वैसे इतने में तो हो जाता है उधर| ट्वेंटी वन की लड़की होती है तो सोचने लगते हैं कि शादी करना है, लड़का देखने लग जाते हैं| 

निहाल: अभी तो तुम काफी जगह चली गयी- आगरा में रह रही हो...

रितु: हाँ, दिल्ली में थी फाइव मंथ| 

निहाल: हाँ, उधर ही तो हम मिले थे ना सबसे पहले- छाँव में| तो अभी तुम इतनी जगह गयी, क्या फर्क दिखता है तुम्हें?

रितु: चेंज आ रहा है लोगों में| लोगों कि सोच बदल रही है| अब लोग आते हैं, सपोर्ट करते हैं हमारा| अभी जंतर-मंतर पर धरना था, उसमे भी काफी लोगों ने सपोर्ट किया| बहुत नए लोग जुड़े| 

निहाल: तुम्हारे केस में जो फैसला आया है, क्या है वो? 

रितु: तीन को लाइफ टाइम, दो को टेन-टेन इयर का सज़ा हुआ है| 

निहाल: तुमपर जो अटैक हुआ था, वो कब हुआ था?

रितु: 26 मई, 2012|

निहाल: ये जो अटैक हुआ, किसी एक ने किया या ज्यादा लोग थे?

रितु: 18 लोगों का ग्रुप था| 

निहाल: अठारह लोग का?

रितु: किसी से बाइक लिया, किसी से कुछ लिया- तो टोटल अठारह लोग थे| जब पकड़े गए तो टेन को छोड़ दिया गया था| टेन-इलेवन को...

निहाल: क्यों?

रितु: क्योंकि किसी को नहीं पता था कि क्या है, किसी को कुछ नहीं पता था, ऐसा सा कुछ सीन था, इसलिए| इसमें से एक फाइव-सिक्स मंथ बाद हाई कोर्ट से जमानत पर चले गए थे| एक लेडीज़ भी थी| 

निहाल: कौन थी वो? 

रितु: मतलब वो दूसरी टाइप की थी- बहुत गन्दी थी| अपने पति को भी मरवा दिया था- ऐसा सुनने में आया था...

निहाल: जो मेन इंसान था, उसका नाम क्या था?

रितु: राम निवास| 

निहाल: राम निवास अभी कहाँ है?

रितु: उसको भी लाइफ टाइम हुआ है| 

निहाल: राम निवास की उम्र क्या होगी?

रितु: अभी वो फोर्टी या फोर्टी-वन का है| पता नहीं उसके मन में क्या चल रहा था| लाइक करता था मुझे..

निहाल: मतलब जब उसने अटैक किया तो वो अर्तीस साल का रहा होगा...

रितु: हाँ दो साल पहले इतने का ही रहा होगा|

निहाल: उसने कहाँ देखा तुम्हें?

रितु: मेरी बुआ का लड़का था वो...

(कुछ देर की चुप्पी)

निहाल: मतलब घर में आना-जाना था उसका...

रितु: हाँ, उनकी बहन को कैंसर था| तो मेरे मम्मी-पापा ने उनका सबकुछ किया था| वो छोड़ के चले गए थे हमारे घर| मेडिकल से लेकर सबकुछ| 

निहाल: राम निवास की बहन?

रितु: हाँ| मेरे मम्मी-पापा ने किया सबकुछ| उसकी बहन के सर के सारे बाल गिर गए थे|

निहाल: राम निवास ने तुम्हें पहले परेशान किया था?

रितु: वो कहता था कि तुम मेरी रिलेशन में नहीं होती तो शादी कर लेता, तुम्हें भगा कर ले जाता...

(प्रणव आ जाता है...)

प्रणव: खाना कैसा बना है? (मुस्कुराते हुए)

रितु: टेस्ट करके देख लो! क्रिस्प नहीं है|

प्रणव: मज़ा नहीं आया| (टेस्ट करते हुए)

रितु: जब भी उसका फोन आता था ना तो सबसे बात करता था| मम्मी से, पापा से| कहता था कि रितु से बात करना है तो मैं मना कर देती थी कि मुझे नहीं बात करना है| मैंने उससे बात करना ही छोड़ दिया था| 

निहाल: इस कारण उसने ये स्टेप लिया... लाइफ टाइम हुआ तो अब वो जेल में है?

रितु: हाँ, वो ढाई साल से जेल में है|

निहाल: तुम अब इस पूरे कैम्पेन से जुड़े हो- स्टॉप एसिड अटैक मूवमेंट से...

रितु: मैं स्टार्टिंग से नहीं जुडी थी| मुझे सेवेन मंथ हुआ| 

निहाल: ये पूरा एक्सपीरियंस कैसा रहा है?

रितु: बहुत अच्छा| पहले मैं फेस कवर करके चलती थी| कैम्पेन से जुड़ते ही मैंने फेस कवर करना छोड़ दिया| और मैं रेड कलर पहनना छोड़ दिया था, क्योंकि रेड कलर पहना था मैंने उस टाइम... मैंने रेड कलर का कपड़ा खरीदा था 18 मई को- मेरी भतीजी का बर्थडे आता है उस दिन| मैंने वो टॉप उसके बर्थडे के लिए रखा था| लेकिन उसके बर्थडे के दिन ब्लैक पहना था| लेकिन मैंने सोचा नया टॉप है, नया टी-शर्ट है, इसको लेकर फोटो खिचवा लेती हूँ| मुझे फोटो खिचवाने का बहुत शौक था (मुस्कुराते हुए)...

निहाल: अभी भी तुम्हें खूब शौक है फोटो खिचवाने का मैंने देखा!

रितु: (ज़ोर से हँसती है) हाँ| मैंने वो टी-शर्ट पहना, फोटो खिचवा कर चेंज भी कर लिया| तो मैंने उस टॉप में बस एक फोटो खिचवाया था, और उसके बाद मैंने उसको 26 को ही पहना था| लेकिन उस ड्रेस को पहन कर कहीं बाहर जाना तो फर्स्ट टाइम ही था|

निहाल: तुम कहीं जा रही थी?

रितु: मैं गेम के लिए जा रही थी| 

निहाल: वोलीबाल के लिए| तुम वोलीबाल हरयाणा के लिए खेलते थे?

रितु: नहीं, मैंने स्टेट लेवल खेला है| चाहती थी की नेशनल खेलूँ| एक अच्छी प्लयेर बनूँ...

निहाल: हरयाणा में मुश्किल है लड़कियों के लिए खेलना?

रितु: बहुत सारी लड़कियाँ हैं...

रमेश: लेकिन सबसे अलग रितु ही है! (वो किसी काम से रितु के पास आते हैं| रमेश शीरोज पर काम करते हैं| )

निहाल: हाँ, वो तो है|

रितु: (हँसते हुए) मुश्किल भी है, और नहीं भी है|

निहाल: हाँ, तुम्हारे साथ भी तो कई लड़कियाँ खेलती ही होंगी|

रितु: मेरे ऊपर अटैक होने के बाद मेरे ही गली की दो लड़कियों ने छोड़ दिया खेलना| हम तीन लड़कियाँ जाती थी खेलने...

निहाल: छोड़ दिया? 

रितु: एक का तो एकदम बंद हो गया था| जो दूसरी थी, कविता, उसने अब स्टार्ट करा है फिर से जाना| 

निहाल: उसने छोड़ दिया, या उसके परिवार वाले भी डर गए थे?

रितु: शायद ऐसा ही रहा होगा|

स्टार्टिंग में... पहले तो लोग बहुत ही अजीब बीहेव करते थे| वैसे बोलते थे सब प्यार से, लेकिन एक अलग ही चेंज दिखता है ना कि कैसे बातें कर रहे हैं| लेकिन अब जबसे कैम्पेन से जुड़ी हूँ, काम करती हूँ अच्छे से, कई बार फेस ओपन करके जाती हूँ- एकदम बिंदास होकर, तो लोगों का बोलने का ढंग भी चेंज हो गया है दुबारा से|

निहाल: कितना अंतर दिखता है तुम्हें अपने लाइफ में- एक तो अटैक से पहले, दूसरा अटैक के तुरंत बाद, और अब तीसरा, कैम्पेन से जुड़ने के बाद? तुम वोलीबाल काफी अच्छा खेलती थी...

रितु: ऐसा भी नहीं कह सकते कि बहुत अच्छी प्लयेर थी| ठीक थी, पर ग्राउंड में सिक्स में तो थी ही! (हँसते हुए)

निहाल: हाँ, अब बहुत सारे लोगों के लिए तो बहुत बड़ी बात होती है ना कि कोई खेलता भी है, और तुम तो इतना अच्छा खेल रही थी|

रितु: मेरे भाई लोग हमेशा पूछते थे कि तू ग्राउंड में खेलती है या एक्स्ट्रा में बैठती है| हमारे गेम में वैसे प्लयेर बारह होते हैं, लेकिन खेलते सिक्स हैं|

निहाल: और तू ग्राउंड में खेलती थी! 

रितु: लिफ्टिंग करती थी मैं| हम सब भाई-बहन खेलते थे...

निहाल: सबलोग वोलीबाल खेलते थे?

रितु: तीनों भाई खो-खो खेलते थे| सबसे छोटा वाला, जो मेरे से बड़ा है, वो तो ऑल इण्डिया खेल चुका है| 

निहाल: तुम सबसे छोटी होगी अपने घर में?

रितु: हाँ, मैं सबसे छोटी हूँ| एक दिन उसके दोस्त ने छिप कर देखा होगा मुझे खेलते हुए...

निहाल: किसने?

रितु: छोटे वाले भाई के दोस्त ने... टूर्नामेंट चल रहा था किसी के साथ रोहतक में ही... बोला होगा भाई, जा एक बार देख कर आ जा (हँसते हुए)! एकदम फॅमिली की तरह है वो| जब मेरे ऊपर अटैक हुआ था तब भी वो सुबह दस बजे आता और रात दस-ग्यारह बजे जाता| मेरी आँख क्लीन करनी होती तो मैं कहती या तो मेरा भाई रवि करेगा, या नितिन भाई करेगा- और कोई हाथ नहीं लगायेगा| 

जब मैं पहली बार टूर्नामेंट खेलने बाहर गयी थी- सोनीपत में पहला टूर्नामेंट था...

निहाल: कितने टूर्नामेंट खेलने गयी इस तरह से?

रितु: बहुत सारे| नहीं पता|

निहाल: कितने साल खेला?
आँखों से बात करती रितु 

रितु: तीन साल खेला| एक साल में चार टूर्नामेंट खेलने तो पक्का बाहर जाती थी| सोनीपत में सेकंड प्लेस आया था| हमारी टीम जब भी जाती तो हार कर आती थी| मेरे ग्राउंड से हम तीन लड़कियाँ ही गयी थी| सबने बोला कि हार कर ही आओगे| मैंने बोला कि शर्त लगा ले! सेकंड प्लेस आया था| 

निहाल: शीरोज़ के बारे में कुछ बताओ? मैं सुबह से देख रहा हूँ सारे पैसे तुम संभाल रहे हो (रितु हँसती है), एक टीम लीडर की तरह तुम सारे काम कर रही हो यहाँ|

रितु: जब मैं पहले आई थी तो मुझे भी लगता था कि मैं बच्चा सी हूँ| सब बोलते भी थे कि तुम थोड़ी मेच्यौर हो जाओ| 

निहाल: तुम्हें मेच्यौर होना ज़रूरी लगता है क्या? 

रितु: मेरे साथ ऐसा है कि सबके साथ बैठ गए, हँस लिया- काम पड़ा है तो पड़ा है| अब सोच रही हूँ कि सबसे लिमिट में बात करो, तो वो सिरियेस्ली लेंगे| फ्रैंक होकर बात करने पर कोई सिरियेस्ली नहीं लेता|

यहाँ पर अकाउंट देखती हूँ, लाइब्ररी में जो बुक्स बाहर से आती हैं वो देखती हूँ| 

निहाल: यहाँ इतनी सारी किताबें हैं, तुम पढ़ते हो इन्हें?

रितु: इंग्लिश नहीं आता मुझे|

निहाल: हिंदी की किताबें?

रितु: हिंदी की किताबें भी हैं, लेकिन इतना टाइम नहीं होता| पर मुझे इंग्लिश सीखना है| 

निहाल: हाँ, अब तुम इतना कुछ कर रही हो, तुम्हें अब दुनिया घूमना है तो इंग्लिश काम आ जाएगा| (रितु की आँखों से पानी गिर रहा था) ये आँखों से पानी क्यों निकल रहा है इतना?

रितु: पता नहीं| मैंने डॉक्टर को दिखलाया| निकलता ही रहता है कंटीन्यूअसली, थोड़ी-थोड़ी देर में| मैं खुद से साफ़ करती हूँ लगातार, तो मेरे आँख और दर्द करने लगता है, और इसके आस पास के स्किन भी| डॉक्टर कहते हैं कि बाकी सब कुछ- जो आँखों का मूवमेंट होता है, आँसू बनता है, वो सब तो होता ही है| 

निहाल: यानी कि आँख का ही पानी है, नोर्मल है मतलब|

रितु: हाँ, नोर्मल है| (थोड़ा रुक कर) मुझे अच्छा लगता है शीरोज़ में काम करना| शीरोज़ और कैम्पेन के साथ काम करना| पहले मैं खूब मस्ती करती थी| काम कुछ करती नहीं थी| लेकिन जब अकेले बैठती थी तो मेरा ध्यान सीधा उधर ही जाता था-क्यों हुआ मेरे साथ ऐसा...

निहाल: अटैक के काफी लंबे समय बाद भी सोचते रहे इस बारे में?

रितु: हाँ| अब भी मैं जब भी खाली बैठती हूँ तो मेरे माइंड में यही चलता है बस| पर अब, कुछ दिन से, मैं अपने आपको फुलटाइम बीजी रखती हूँ| यहाँ सुबह आ गयी, थोड़ा सेटअप किया...

निहाल: हाँ, मैंने देखा तुमलोग सुबह दस बजे से रात बारह बजे तक यहाँ रहती हो!

रितु: हाँ, रात के बारह बज जाते हैं| बीजी रहते हैं तो अच्छा लगता है| यहाँ से गए, फ्रेश होकर सो गए, सुबह उठते ही फिर यहाँ आ गए| 

निहाल: अटैक के बाद परिवार वालों का क्या रीएक्शन था?

रितु: मेरे परिवार वालों ने मेरा बहुत सपोर्ट किया| परेशान तो थे| मेरे अटैक के थोड़े टाइम बाद पापा को चोट लग गया था- बेड से गिर गए थे वो| पता नहीं क्या था- बेड कितना ही ऊँचा होता है- उस पर गिरे तो उनके हिप्स पर से फ्रैक्चर हो गया था| फर्स्ट ऑपरेशन सक्सेसफुल नहीं हुआ| अभी सेकंड कराया है, वो सक्सेसफुल हुआ है, लेकिन सर्दी इतना है कि... मैं बात भी करती हूँ तो रोने भी लगते हैं वो| तो दुःख भी होता है इस बात का कि पूरे फॅमिली को बांधे हुए थे| वो ही खर्चा चलाते थे, सबकुछ उनके ही हाँथों में था| वो एक साल से बेड पर हैं- एक साल से ऊपर ही हो गया| 

निहाल: घर पर सभी चीज़ों का ख्याल कौन रख रहा है? भाई? 

रितु: भाई हैं| बड़े से छोटे वाला| बड़ा वाल भी अच्छा है बहुत, लेकिन बड़े से छोटे वाला ज्यादा केरिंग है| 

निहाल: तुम अपने घर वालों से मिलते रहते हो ना?

रितु: हाँ, जब भी मेरा मन करता है तो मैं चली जाती हूँ| 

निहाल: और फोन पर बात होती है?

रितु: हाँ| हो जाती है| अब तो थोड़ा बीजी रहती हूँ तो नहीं हो पाती है| कभी मैं कर लेती हूँ, कभी पापा कर लेते हैं| दिल्ली में रोज मैं कर लेती थी| पर अब ऐसा नहीं हो पाता है| सुबह से शाम तक बीजी रहती हूँ| फोन आता है तो बोलती हूँ पापा काम कर रही हूँ, बाद में बात करुँगी| रात में बारह बजे फ्री होती हूँ, तो वो सो जाते हैं| इसलिए बात कम ही हो पाता है|

फोन भी एकदम छूट सा गया है| पहले मैंने मोबाइल लिया तो सारा दिन व्हाट्स ऐप में लगे रहते थे! न्यू-न्यू फोन में तो ऐसा होता ही है (ज़ोर से हँसती है)- चाहे कुछ आये या ना आये| तो फिर अलोक भाई बोले, “ठीक है, ये हो गया तो कुछ और भी देख लो|” अब तो काफी टाइम हो गया| फोन पर ज्यादा देर नहीं रहती| 

(कुछ देर की चुप्पी)

निहाल: तुम्हारी सबसे प्यारी बात बताऊँ क्या है- तुम्हारी स्माइल| सब बोलते होंगे ना?

रितु: (हँसते हुए) थैंक यू| हाँ, दो कस्टमर हैं| दोनों लड़कियाँ हैं| उनकी मम्मी भी आती हैं साथ में| तो वो एक दिन कहती हैं कि मुझे तुम्हारी स्माइल बहुत अच्छी लगती है| वो फेसबुक का पेज भी फोलो करते हैं, तो कहते हैं कि हम ढूँढ़ते हैं कि तुम कौन सी फोटो में स्माइल करते मिलोगी (ज़ोर से हँसती है)|

निहाल: और राहुल (सहारन) ने तुम्हारी फोटो ली है खूब सारी| (कैफे में दीवाल से लगे कई फोटो को देखते हुए मैंने ये सवाल पूछा)

रितु: हाँ, राहुल भाई में ये सब फोटो ली है| अभी तो कैलेंडर का फोटोशूट भी होना है| पहले रूपा दी की डिजाईन किये हुए कपड़े के लिए मॉडल के साथ फोटोशूट होना था| फिर किसी ने कहा कि जब हम सभी मॉडल हैं (सभी एसिड अटैक फाइटर), तो बाहर से किसी मॉडल कि क्या ज़रूरत (ज़ोर से हँसते हुए बताती है)|

निहाल: ये तो अच्छा है ना| तुम्हें पसंद भी है फोटो खिचवाना|

रितु: हाँ| 

निहाल: तुम्हारे फेसबुक पेज पर भी बहुत लोग तुम्हें फोलो करते हैं| तुम खुद से हैंडल करती हो या नहीं करती? 

रितु: मैं रोज उसे देखती हूँ| दिन में एक बार तो पक्का देखती हूँ| पोस्टिंग अलोक भाई करते हैं| 

निहाल: अरे, मुझे लगा वहाँ हम तुमसे बात करते हैं| लेकिन अलोक से भी बात होती है वहाँ!

रितु: मैं भी रोज देखती हूँ ना एक बार| लेकिन बहुत ज्यादा टाइम नहीं दे पाती उसको| बहुत कुछ सोचना भी है|

निहाल: क्या सोचना है?

रितु: मैं ये सोचती हूँ कि रूपा दीदी डीजाईनर के नाम से जानी जाती हैं, मैं भी एक पेंटर के नाम से जानी जाऊँगी| 

निहाल: तो तुम्हें पेंटिंग का शौक है?

रितु: शौक तो मुझे खेलने का था| लेकिन अब मैं नहीं खेल सकती| मैंने दो बार कोशिश की है| अटैक के एक साल बाद पहली बार ट्राई किया था| मेरे फेस पे ही बौल लगा था| मुझे अब बौल नहीं दिखता है| मेरे लेफ्ट आँख की वजह से राईट आँख में भी प्रॉब्लम होता है| 

असीम भाई (असीम त्रिवेदी) कह रहे थे कि कार्टून बनाना सीख लो| मुझे ऐसा लगता है कि मुझे बहुत कुछ सीखना है लेकिन उसके लिए कोई चाहिए तो मुझे प्रोपर टीचर की तरह एक दिन में एक घंटा सिखाये| जैसे स्कूल में, या ट्यूशन क्लास में सिखाते हैं| 

मुझे अब कुछ भी सीखना है| अब... मैं यही चाहती हूँ कि लोग मुझे मेरे काम से जाने| कैम्पेन से जुड़ी हूँ, तो लोग जानते हैं| लेकिन मुझे मेरे काम से जाने| 

निहाल: हाँ बिल्कुल| और मेरे ख्याल से कैम्पेन का पूरा मकसद भी यही है कि हर फाइटर को लोग उनके काम के लिए जाने| 

रितु: हाँ, यही है| मुझे ऐसा लगता है मुझे हर चीज़ के लिए बहुत पुश किया सबने| अब जैसे आप फोटो खीचते हो, मैं बहुत फोटो खिचवाती थी पहले| फिर अटैक के बाद छोड़ दिया| जब कैम्पेन से जुड़ी तो लोगों ने फोटो खीचना शुरू किया| बोला कि अच्छी फोटो है| फिर मेरे अंदर दोबारा से हिम्मत जगी| पहले मुझे लगता था कि मुझसे कुछ भी नहीं हो पायेगा| फिर सबने हर चीज़ के लिए बहुत पुश किया| और अब... करना है सब| 

निहाल: तो तुमने किसी से बात की पेंटिंग सीखने के लिए?

रितु: एक कस्टमर आई थी, वो बहुत अच्छी पेंटर हैं- बहुत ही अच्छी|

निहाल: यहीं आगरा की रहने वाली हैं?

रितु: हाँ| वो सीखाने के लिए भी तैयार हैं| लेकिन अभी कैफे में लोग चाहिए| अभी ठीक से सेट नहीं है कैफे| एक बार रन करने लगा तो हमारे पास बहुत टाइम होगा| 

निहाल: अच्छा, रितु को सबसे ज्यादा क्या पसंद है?

रितु: (ज़ोर से हँसते हुए) मुझे शौपिंग करना बहुत पसंद है| लेकिन अब थोड़ा छुट सा गया है| 

मुझे ना ऐसा लगता है कि दूसरों को कोई हर्ट ना करे| मैं किसी को हर्ट नहीं कर सकती| बहुत से लोग होते हैं वो किसी की टांग खीचने में लगे रहते हैं| एकदम इरीटेट करने वाले बंदे होते हैं| कितना दिल दुखता है| मैं नहीं कर सकती है| सबको चोकलेट कितनी पसंद है- मुझे भी पसंद है| लेकिन मुझे दूसरों को खिलाना ज्यादा पसंद है| 

निहाल: सच में?

रितु: सच में| परसों कोई चोकलेट लेकर आया था| मैंने सबको खिलाया, खुद सिर्फ एक बाईट खाया| उसमे भी मुझे बहुत मज़ा आया| ज्यादा खा भी नहीं पाती हूँ|

निहाल: कौन सी चोकलेट पसंद है तुम्हें?

रितु: (मुस्कुराते हुए) डेरी मिल्क वाली| 

निहाल: तुम्हें घूमना पसंद नहीं? अलग-अलग शहर जाना? 

रितु: पसंद है|

निहाल: आगरा शहर में हो तुम, घूमा नहीं?

रितु: ताज महल गयी सिर्फ| एक और भी जगह गए थे, उसका नाम याद नहीं| ज्यादा टाइम नहीं होता|

निहाल: कैफे किसी भी दिन बंद नहीं होता?

रितु: नहीं| एक दिन का हाफ-डे करने का डिसाइड हुआ था| पर घर में क्या करना है| तो मैं उस दिन भी सुबह-सुबह आ गयी| ऐसा लगता है जहाँ जाएँ साथ जाएँ सबलोग|

आप ये खाओ ना| (फ्रेंच फ्राई के तरफ इशारा करते हुए)

निहाल: नहीं, तुम खाओ| मैंने बहुत खा लिया| ज्यादा खाऊँगा तो मोटा हो जाऊँगा| तुम खाओ| तुम बिल्कुल भी मोटी नहीं होगी| तुम हमेशा से इतने ही दुबले-पतले से हो?

रितु: हाँ| जब मेरा बहुत वजन भी होता था तो थर्टी-फाइव किलो से ज्यादा नहीं हुआ| अभी तो थर्टी-नाइन की हूँ|

निहाल: बस थर्टी-नाइन! उम्र कितनी है तुम्हारी?

रितु: नाइंटीन ईयर्स|

निहाल: बस उन्नीस साल की हो तुम?

रितु: हाँ, क्या हुआ?

निहाल: नहीं, मुझे पता नहीं था| तुम तो बहुत छोटी हो अभी| पढ़ाई क्या किया तुमने?

रितु: मैंने टेंथ किया| 

निहाल: उसके बाद?

रितु: अटैक हो गया था|

निहाल: अटैक के बाद पढ़ाई बिल्कुल भी नहीं?

रितु: मुझे देखने में प्रॉब्लम होता है|

निहाल: आगे पढ़ाई करने का सोचा है?

रितु: देखेंगे|

निहाल: उन्नीस साल की हो| पढ़ाई ज़रूर करना...

रितु: (हँसते हुए) हाँ| मुझे बस इंग्लिश सीखना है, और कुछ नहीं|

निहाल: इंग्लिश तो तुम सीख लोगी आराम से| 

(कुछ देर बाद)

रितु: अच्छा, आप और भी लोगों से बात कर सकते थे| आपने मुझसे ही बात करने का क्यों सोचा? आपको किसी ने बोला?

निहाल: मुझे किसी ने बोला नहीं| मैंने खुद से सोचा| जब पिछली बार हम आये थे ना तुम्हारे घर (मैं दो महीने पहले एक रात के लिए रितु और बाकी फाइटर्स के आगरा वाला फ्लैट पर रुका था किसी काम के वजह से), तो मुझे उस वक्त लगा कि तुम्हे स्माइल इतनी प्यारी कैसे है| हम सभी के जीवन में कुछ ना कुछ होता है, और उसके कारण हम उदास रहते हैं| लेकिन तुमने हम सबसे बहुत ज्यादा कुछ देखा है, बहुत कुछ झेला है| और उसके बाद इतनी खूबसूरत स्माइल! तुम्हारी स्माइल मुझे बहुत इंस्पायर करती है| और इस पर तो कोई भी फ़िदा हो सकता है!

रितु: (हँसते हुए) थैंक यू!
शीरोज़ हैंगआउट कैफ़े को संभालती रितु 

निहाल: तुम्हारी फेवरेट फिल्म कौन सी है?

रितु: विवाह| अच्छी लगती है मुझे| वैसे मैं मूवी बहुत कम देखती हूँ|

निहाल: और फेवरेट हीरो कौन है?

रितु: सलमान खान! (हँसते हुए)

निहाल: हाँ, ये सब तो इंटरव्यू में पूछना होता है! और फेवरेट हेरोइन कौन है?

रितु: कैटरीना कैफ| और थ्री इडियट्स फिल्म भी पसंद है| 

निहाल: अरे वो तो मुझे भी बहुत पसंद है|

रितु: कितना अच्छा है ना| मैं मिलना भी चाहती हूँ उससे... कौन है वो- आमिर खान ना?

निहाल: हाँ|

रितु: यहाँ पर आने वाला था, फिर आ नहीं पाया| 

निहाल: तुम अभी आगरा लंबे टाइम के लिए हो?

रितु: हाँ| अभी तो लंबे टाइम के लिए हूँ| आगे का कुछ सोचा ही नहीं है| बस मैंने ये सोच लिया है कि कुछ करके दिखाना है| उनको सज़ा हुई है लेकिन उन्होंने सोचा होगा कि ये घर में बैठ जाएगी या मर जाएगी| मुझे अपने काम से ऐसा दिखाना है कि तूने मेरे साथ जो कर दिया सो कर दिया लेकिन अब भी मैं कुछ कर रही हूँ, और मेरा नाम है| और उसको थैंक यू बोलूँगी कि तूने मेरे साथ ऐसा किया| अच्छा कर दिया मेरे साथ- ठीक है... (कुछ देर की चुप्पी)

निहाल: काफी गुस्सा भी आता था कभी?

रितु: स्टार्टिंग में मैं सोचती थी कि इससे अच्छा गोली मार देता, या जान से मार देता तो अच्छा रहता| इस फेस को लेकर नहीं जीना पड़ता| लेकिन आज इस फेस पे बहुत... (चुप हो जाती है)

निहाल: अभी जो पिछला कैम्पेन था हंगर स्ट्राइक का, उसमे हर जगह तुम्हारा ही चेहरा था| मैंने तुम्हारे चेहरे को ही अपने फेसबुक का प्रोफाइल फोटो बनाया था| 

रितु: (मुस्कुराते हुए) हाँ, प्रोफाइल पिक्चर सब लोगों ने मेरा ही लगा रखा था| 

निहाल: अब हर कोई अपना चेहरा तुम्हें बनाना चाहता है| 

रितु: अच्छा है| लोगों की सोच चेंज हो रही है| बस यही सोचा है कि हर एक बंदा चेंज हो जाए, अच्छा सोचे सबके लिए... जानते हो आप, मुझे ऐसा लगता है ना कि मैं हूँ, आप हो, प्रणव भाई हैं (शीरोज़ के मैनेजर, जो हमसे बस थोड़ी दूर बैठे थे), ये लोग अच्छे हैं ना, तो सामने कोई गलत बंदा भी होगा तो उसको भी ठीक कर देंगे| अभी तीन-चार दिन पहले एक कस्टमर आया| उसने मेरे से काफी बातें की| फिर उसने बोला कि वो यहाँ से बहुत कुछ सीख कर जा रहा है| मैंने नहीं सोचा था ऐसा भी होता होगा| 

तो, आपने बस मेरी स्माइल देख कर इंटरव्यू ले लिया? (हँसती है)
आगरा शहर में शीरोज़ हैंगआउट 

निहाल: मैंने इंटरव्यू कहाँ लिया, हमने तो बातें की| बस इसको बिना काटे-छाँटें लिख दूँगा| 

रितु: आप जब लिख लेना तो मुझे भी देना|

निहाल: तुम्हें तो सबसे पहले| फिर तुम अपने पेज पर शेयर करोगी ना!

रितु: (हँसते हुए) हाँ, ज़रूर|

निहाल: तो आप कुछ कहना चाहती है बाकी लोगों से?

रितु: हाँ, मैं एक मैसेज देना चाहती हूँ और सर्वाइवर्स के लिए| बहुत सी सर्वाइवर अभी भी हैं जो बाहर नहीं आ रहीं हैं| उन्हें बाहर आना बहुत ज़रूरी है| अपने हक के लिए लड़े- इस समाज से लड़े| अपने लिए लड़े| कोई एक इंसान स्टेप उठाता है तो बाकी और चार लोगों के लिए भी सफर आसान हो जाता है|

निहाल: बिल्कुल तुम्हारी तरह| 

रितु मुस्कुरा देती है |
------

बातचीत हमारी और भी कुछ देर चली| इस बातचीत से सीखने को काफी कुछ मिला| कुछ मौके ऐसे होते हैं जब आप इंसानियत पर से भरोसा खो चुके होते हैं| लेकिन फिर, रितु के जुबान से इतनी उम्मीद भरी बातें सुन कर जिंदगी से प्यार सा हो जाता है| बहुत मुश्किल है जिंदगी में ख़ूबसूरती तलाशना- लेकिन हम सभी अंततः वही तो कर रहे होते हैं| रितु ने सिखाया कि जीवन किस कदर खूबसूरत है| 
------

An edited English version of the interview was also published on LokMarg on February 3, 2015
Permalink: http://lokmarg.com/life-hopes-and-acid-in-conversation-with-acid-attack-fighter-ritu/

English version of the interview on this blog is available here:
http://nihalparashar.blogspot.in/2015/02/life-hope-and-acid-conversation-with.html

Sunday, September 29, 2013

The Company Theatre is celebrating 20 Years of excellence- an interview with Atul Kumar


Twenty years must be a long time- a long time to walk the journey of creating newness, of living excitement, of listening to claps and expressing yourself the way you want to. It has been a journey worth celebrating for The Company Theatre, which was founded by ace theatre person Atul Kumar in 1993. Here Atul shares his memories and vision for the celebration called The Company Theatre.


Nihal: Twenty long years of a journey called The Company Theatre! Who better than you can describe it, Atul. How would you like to sum up these twenty years?

Atul: 20 years full of excitement, life, ups and downs, but no regrets- only gratitude to hundreds of fellow artists and thousands of audience members all over the world, especially people who believed in our madness and joined hands in some way or the other.

Nihal: Which is that one moment which comes to your mind when somebody says ‘The Company Theatre’?

Atul: When I was sitting with Raza Sahib (the great Indian Artist) in Paris once at his flat and he was very angry with me that I did not chose a name that was Indian or Hindi for that matter- that I chose a name that reminded him of the British occupation! I could not say anything to him… I just went numb!
A scene from ‘Piya Behrupiya’, much acclaimed production of TCT

Nihal: In past decade or two you have occasionally collaborated with Rajat Kapoor as an actor and also as a director. How has it been working with Rajat, who is also your old friend, and also other friends?

Atul: Not only Rajat, but all artists one works with in TCT, are my friends. I don’t think it is now possible for me to work with people only professionally and not have an emotional personal bond with them. That is why we don’t really audition. We allow everyone to join us and then whoever becomes a part of the family and on whom we can trust and keep faith and agree to fail with, becomes a part of the family. So its not only Rajat, it’s many-many more people who are first friends then fellow artists. And to work and make theatre with friends is always a big party!
A scene from ‘Noises Off’ by TCT

Nihal: Is Atul Kumar a voracious reader as well? If yes, then what does he loves to read and what was the last book he read?

Atul: I used to read voraciously. No more. Now I watch a lot of cinema. I read a lot of non-fiction and mostly books on theatre. My most favorite these days and the last one is ‘An Actor’s Tricks’ by Yoshi Oida.

Nihal: Was there a plan ever in your mind when you were in college to create a workspace as you have created one in Kamshet? Was Kamshet accidental or well planned?

Atul: It has been a dream since last 15 years or more. I think it was always well planned. Only plans don’t go as they are planned. So lots of compromises and obsessive chasing the dream, but voila- it is finally there!

Nihal: What are your future plans for The Company Theatre? Can you tell us about the plays you plan to direct in the coming time for TCT?

Atul: We are working on the idea of Heer, also on Midsummer Night’s Dream, then again playing with the idea of object theatre and Haroun and the Sea of Stories- and a thousand more plays and texts and ideas which will only remain ideas in the life time!

This interview was first published in My Theatre Cafe on September 21, 2013
Permalink: 

Thursday, August 15, 2013

Atul Kumar: ‘Noises Off’ will bring madness, energy, happiness, fun and laughter to Delhi


Atul Kumar and The Company Theatre need no introduction in contemporary Indian theatre. There is no blinking to the fact that Atul has been able to give a new definition to theatre in India with his extremely honest plays. Here Atul talks about his life and his upcoming shows of Noises Off in Delhi, which is scheduled on August 16, 17 and 18 at Kamani Auditorium.


Nihal: Delhi loved your play ‘Piya Behrupiya’. And believe me, we still talk about it with great enthusiasm. Now you are coming with your latest production ‘Noises Off’. What shall the Delhi Junta expect?

Atul: Same madness, energy, happiness, fun and laughter but without live music this time. It is a play within a play and invites the enthusiastic and curious eye to peep into backstage of a disastrous play put up by an even more disastrous ensemble played by our actors. It is a famous and typical English farce so expect loud and exaggerated acting styles and over the top humour.

Nihal: What lead you to select Noises Off, which is undoubtedly a great play and has been performed numerous times throughout the globe? As a director what is that you have played with?
A scene from Kumar’s Noises Off
Atul: I love the 2nd act when the set turns around and you see backstage business of a theatre company as they perform over the other side to the cyclorama. I like cheap farcical act constantly broken by the real actor rising forth and then a constant in and out- creating and breaking the illusion. And
my God it does have some of the funniest lines I have read-seen in theatre. Ever. We did this play in Mumbai in 2003. This is a revival after 10 years. With some old and some new cast members. Why a revival. Well, its just outright fun to do this play- each rehearsal day was a party and we would do it again and again- everyone in the team is on a high.

Nihal: You have stayed in Delhi for a long time. Can you share with us a bit about your relation with Delhi?

Atul: I was born here, studied here in school and university, fell in love here, had heart breaks here, got into fights here and walked the long roads in winters here, saw the 60s and then 70s and then 80s and even 90s in Delhi- so you can imagine I am in many ways a Delhite still. This is where it all started –this love story between me and theatre.

Nihal: What is your take on the theatre culture of Delhi?

Atul: It produces less and less theatre than in 70s, 80s and 90s but it still produces some of the best in the country. Delhi has theatre makers like Maya Rao, Anamika Haksar, Anuradha Kapoor, Amal Allana, Zuleikha Allana, Arjun Raina, Neel Chawdhary, Amitesh Grover and many more who are still making work that the entire country admires and looks forward to seeing. Audiences have been coming to see our shows of Hamlet, Lear, Piya, The Blue Mug in great numbers so I am assuming we have managed to create our own audience in Delhi- hope that is true and we can keep coming back. Delhi still has theatre poster culture with theatrewallahs going around all over Delhi and putting up posters in hundreds- such fun! Something that is not a culture in Mumbai Bangalore Chennai- at least not in such great numbers!

Nihal: As a recent trend, we have seen many comedies in our city. The newer production houses prefer performing comedies than any other genre. What is your take on this?

Atul: Everyone must do what they feel strongly about- it’s a free world- more so in the arts. So no complaints. We dabble in tragedies like Hamlet and Lear but also do 12th Night and Noises Off- then again within each of creations you will see a nice balance of not only tragedy and comedy but also of other sub-genres. We try to listen to our instinct and if we do comedies only for the next ten years does not mean we have discriminated another genre. Each to his own.

Nihal: How has been the journey with The Company Theatre?

Atul: This is our 20th anniversary year. The Company Theatre was formed in Delhi in 1993. This year we celebrate 20 solid years of all kinds of performances and shows all over India and abroad. We celebrate it in form of performances all over India including Chennai, Mumbai, Baroda, Delhi, Bangalore and finally at our newly built theatre residency in Kamshet, Maharashtra.



This interview first appeared in My Theatre Cafe on August 7, 2013
Permalink:

Kenny Basumatary Tells Us How A Feature Film Can Be Made With Just One Lakh Rupees


I was supposed to meet Kenny in Mumbai in 2011 and we were to act in a short play together. But somehow it did not materialize. Anyway, I met Kenny in the last edition of Osian Cinefan where his film, Local Kung Fu, was selected to be screened for the public. I had a laugh riot watching the wonderful action-comedy. Now Local Kung Fu is being released by PVR on August 23rd in select cities. Local Kung Fu is certainly India’s first martial arts comedy made in a budget of only INR 1 Lakh! Kenny and his film forms a very important part of the emerging Indie Film culture, and we hope they are here to stay!

Kenny Basumatary

Kenny Basumatary is an actor, novelist, musician, and a wonderful person to chat with. Here he talks about his film Local Kung Fu.

Nihal: Now that your wonderful film is all set to be released by PVR, can you share with us the experience called “Local Kung Fu”?

Kenny: I’m probably going to write a book about it!

Nihal: We heard the budget of the film was just $2000, when Rupee was performing fairly better. Is this for true?

Kenny: Yes, we made a feature film with Rs. 1 Lakh and now it is being released in theatres! We had a Lakh to do whatever we wanted with. So this is what we spent it on: Rs 58,000- Canon 550D camera, accessories, lens; Rs 5,000- Rode VideoMic, Rs 15,000- Token payments for actors because something is better than nothing; the rest- on petrol, 150 rice cakes and about 200 plates of momos and noodles.

Nihal: How do you want people to recognize you: ‘Hero of Local Kung Fu’, ‘Director of Local Kung Fu’ or ‘Producer of Local Kung Fu’?

Kenny: Why would I want to be known as a producer? But the honest truth is I wish there was some way I could become an actor/director without people recognizing me. It takes a lot of effort from me not to be socially awkward, and when people recognize you or want to talk to you, you have to be polite otherwise they’ll go and tell others, “What an asshole.”

Poster of the Film

Nihal: What are your future plans? Shall we expect to see another action film from you?

Kenny: Of course, but ideally I would like to make a romantic comedy first. Maybe if I find a financer for making the film of my novel Chocolate_Guitar_Momos. I’ve also started my second novel – My Three Sisters. I’d love to make films in different genres. A schooldays comedy is also on my mind, but then, it all depends on what gets financed first.

Nihal: Any special moment from the film which you want to share with our readers?

Kenny: Well, my brother met his wife during the shoot. So that’s definitely special. We had so much fun throughout the whole process that I sometimes wonder why I would make anything that wasn’t comedy.
A scene from the film

Nihal: Before signing off, can you tell us why should one come to see Local Kung Fu?

Kenny: I’d like to invite everyone to come watch Local Kung Fu in theatres. Not to support independent cinema or something. But just to be entertained for 93 minutes. I can’t promise that it’ll change your life or make you a better person, but I can guarantee that it won’t bore either you or your nieces and nephews and cousins and parents and grandparents.

You can watch the trailer of Local Kung Fu HERE.

This interview first appeared in Youth Ki Awaaz on August 7, 2013 and in My Theatre Cafe on August 12,2013
Permalinks:










Thursday, May 16, 2013

Meet Manav Kaul: Life is nothing but a journey of normalization of surprises!


I met Manav Kaul as a fan, inspired by his plays, stories and poems. Later I spent some time with him at various places. This interview was taken in mountains of Uttarakhand, during Sonapani Film Festival where Manav was one of the three featured filmmakers, along with Sriram Raghavan and K.U Mohanan. It was late in the evening. We were having a random conversation. I asked Manav if I can record our conversation. He allowed and here it is- an interaction with Manav Kaul.
Manav Kaul looks with a calm face during conversation
Photo: Pooja Sharma


Nihal: Manav, you have been into theatre for a long while. Now you are making films as well. What is the major difference you find in both the medium?

Manav: Major difference is of ‘History’. Theatre does not create history. It is a momentary art. Film creates history. You capture a frame, and that is history. Cinema is closer to life. You have to live life every day. You cannot a live a good day and that is over. You have to live everyday- morning to night-morning to night- evening. Living a good day is a tragedy, because you want to recreate it, just like we do it in theatre. And that is a trap. Even film is a trap. But that is captured. That is history. Now it is your problem how much you carry it on your shoulder. If you do not carry it as a baggage then you are a great person. If you carry it, then you are a very small person.

Nihal: What do you mean by baggage?

Manav: It is not a baby. It was teamwork, and it is over. It is history.

Everything you do has significance. It can give you happiness for a small period of time, and that is all- nothing more than that. That’s what life is. You liked one evening, maybe this one. Now you want to recreate it. You want everything similar- same bonfire, same songs, everything same. But that is not happiness. Happiness comes when it is most unexpected.

When are you surprised? You watch a play for the first time. Second time you will not be surprised. You will want to recreate the surprise in the third time, but for no use. I know that I do not know filmmaking. And this feeling is amazing. Our life is nothing but a journey of normalization of our surprises.

Nihal: I read one of you interviews few years back. The interviewer remarked that theatre is dying. You replied saying let it die. Why this approach?

Of course yaar. It must die as soon as possible. If it is dying let it die. I will kill it. Because if it will not die how will a space be created? It needs o die for something new to emerge. And most important: how many of us need theatre? No one needs theatre. We all are joking around. “We must save theatre”, “Theatre needs to survive”- non sense. Who goes to watch theatre? Those who are doing theatre shout aloud to save it. It is a business for them. If you make shoes you will like everybody to buy shoes. If people start buying slippers you will go mad.

Nihal: I was attracted towards your writing. I always felt you write different from other contemporaries. You have read a lot of literature. When did you start reading- College or school?

Manav: I never used to study. I started studying when I came to Bombay.

Nihal: When did you come to Mumbai?

Manav: 1998. One must study when he feels like studying. You start smoking not for the sake of smoking but to look cool. You consume alcohol to prove that you have grown up. You never like smoking or drinking. Similarly you start reading- to show that I also read. “Who is Chekhav! Who is Brecht! I will also see!”

Many people say you came to Mumbai to become an actor, but… . You know most wonderful people are those who changed themselves because they wanted to lead a great life. I admire those who still want to do something new at an age of 50 or 55. I do not see myself making films in the long run. Money is the most worthless thing I have come across. Since childhood we all have been scared by the society. Society sells LIC policies to us- if you do not save money you will have a bad life.

Nihal: What influenced you most- any particular incident or a person?

Manav: My laziness inspired me most. Every human is basically lazy, and wants to keep himself in a comfort zone. So I write, because I am a writer. But actually I sleep a lot. I do not want to do a ‘daily job’. I want a comfortable life.

Nihal: Didn’t Nirmal Verma influence you?

Manav: Of Course yaar. Your writing gets influenced by different people. Nirmal Verma, Vinod Kumar Shukl, Coetzee- they all influenced me. Camus influenced me most. I have read ‘Outsider’ numerous times.

Nihal: You are reading something right now?

Manav: I am reading Coetzee these days.

Nihal: You influenced many people in my university- D.U. Many colleges used to perform your plays. You watch your plays performed by others?

Manav: Never. People often call me to watch my own play. But I do not even watch my own directions. I feel so naked because I have written it, and I have also directed it. I watch the grand rehearsals. That is my show.

Any fiction is auto-biographical first. When you write a diary, you do nothing but lie. But when you are writing a story, you are honest.

Nihal: Why is it so?

Manav: Because when you write a diary, you are hero of the story. Everybody wants to be a hero. That is why fiction is more interesting. You do not even realize and you share your complexes, your dilemmas, et al. I am old now. I may have forgotten incidents, but the experiences come in my stories. I like ‘Mamtazbhai Patangwaale’.

You know the most interesting thing?

Nihal: What is it?

Manav: ‘Nobody knows anything’. I tell this to every youngster. Nobody knows anything. Everybody is essentially afraid. And when everybody is afraid, why shall we take any tension? Say whatever you feel like.

Nihal: You are a philosopher…

Manav: Arey, nothing like that! (Laughs). I feel mind can’t work with anything. But we need reasons to live. How will you live? You do a certain work once and spend entire life just accumulating reasons for it. I do the same.

Nihal: You justify yourself?

Manav: I will not call it ‘justify’. No one is asking you anything. You are looking for reasons to live, reasons to say that what I am doing is the best. And then you meet likeminded people who say ‘Yes, you are doing a great job.’

Acting is a lie. Stories are lie. Narration is a lie. Direction is a lie. I create a false life, and try to put truth in it. How is it possible? But then, one looks into his personal life and realizes, “how false is our own life?”

A bird is most amazing. It is enlightened. We all are fools, because we are looking for reasons to live.

Note: This interview is an English translation of the original interview in Hindi. The Hindi interview can be accessed here:http://nihalparashar.blogspot.in/2012/12/blog-post.html

This interview first appeared in MyTheatreCafe.com on May 11, 2013.

Friday, February 15, 2013

कठपुतली कॉलोनी: एक लंबी कहानी का अंतिम पैराग्राफ

कुछ दिनों पहले कॉलेज में पढ़ाई के दौरान किसी कारण से कठपुतली कॉलोनी का नाम सुना| नाम बड़ा रोचक लगा| इसके बारे में पता करने की कोशिश की| एक फ़िल्मकार कि फिल्म का ट्रेलर भी देखा जो इसी कॉलोनी के ऊपर बन रही है|

अपने आपको कलाकार समझता हूँ इसलिए जितना हो सका कठपुतली कॉलोनी के बारे में पता करने की कोशिश करता ही रहा| कठपुतली कॉलोनी दिल्ली के सी.पी (कनॉट प्लेस) से बस छः किलोमीटर की दूरी पर है| करीबन आधे सदी पहले घुमंतू लोग इस इलाके में आकार बस गए थे| ये जादूगर और कठपुतली नचाने वाले खानदानी कलाकार थे जो सदियों से अपनी धरोहर को सम्हाले देश के कोने-कोने जाते| इस जगह को इन्होने घर मान लिया| यहाँ काम भी मिलने लगा| ये यहाँ के हो गए| 

जैसे-जैसे बाज़ार बदलता गया, इनकी आर्थिक हालत खराब होती गयी| सरकार ने इनके कला के विकास और बढ़ावे के लिए कोई कदम नहीं उठाये| जिन कलाकारों को बेशुमार इज्जत मिलनी चाहिए थी उनके रहने और खाने के भी दिक्कत होने लगे| 

कठपुतली कॉलोनी का प्रवेश
फोटो: निहाल 
जब मैं पहली बार कठपुतली कॉलोनी गया, जो कि शादीपुर मेट्रो से पाँच-दस मिनट के दूरी पर है, तो मुझे आश्चर्य हुआ कि इतनी गन्दगी में भी कला कैसे जिंदा है? इतना ज़रूर समझ गया कि ज़्यादा दिन जिंदा नहीं रहने वाली| इन्टरनेट पर रिसर्च के दौरान पता चला कि पूरे के पूरे कॉलोनी को रहेजा डेवेलपर्स को बेचा जा चुका है सरकार द्वारा, और कलाकारों को आनंद पर्बत इलाके में बसाने की योजना है|

कठपुतली कॉलोनी में जाते ही एक बहुत बड़ा कूड़े का ढेर है जहाँ सूअरों का झुण्ड कचरे के ढेर में से खाना खोजता रहता है| छोटे बच्चे वहीँ खेल रहे होते हैं| पूरे गली में खुला नाली दौड़ लगा रहा होता है| मध्य वर्गीय पालन पोषण के कारण ये दृश्य बहुत घिनौनें लगे| दुर्गन्ध थी वहाँ| उलटी आने ही वाली थी| नाक पर हाथ रख कर किसी तरह अंदर गया| पाँच मिनट के बाद नाक को वो बदबू सामान्य लगने लगा| उलटी नहीं हुई|

सबसे पहले एक दवाई के दूकान पर जाकर बातचीत शुरू की| दवाई दूकान वाले भाई ने जानकारी दी कि कॉलोनी में लोगों कि तबियत बहुत खराब रहती है, लेकिन पैसा ना होने के कारण बहुत लोग इलाज नहीं करवाते| ये भाई भी दुखी थे और दूकान बंद कर के कुछ और काम करने कि सोच रहे थे| 

उनके दूकान पर एक युवक आया, जिसको फीवर था| वो कोई इंजेक्शन लेने आया था| उनसे भी बात शुरू हुई| उन्होंने बताया कि वो खानदानी कठपुतली कलाकार है लेकिन अब शादियों में ढोल बजाता है| कठपुतली कॉलोनी के अधिकतर नौजवान अब शादियों में ढोल बजाते हैं या इसी तरह का कुछ और काम करते हैं|

इस आदमी ने मुझे बतलाया कि अगर ज़्यादा जानकारी चाहिए तो मुझे दिलीप प्रधान जी के पास जाना होगा, जो कॉलोनी के बुज़ुर्ग हैं| दिलीप जी घर का रस्ता बहुत आसान था| गली में जिससे भी पूछा उसने पहुँचा दिया उनके दरवाजे तक| मुझे ऐसा लगा कि वो शायद गाँव के मुखिया होंगे जिनके पास काफी जानकारी होगी| 

दिलीप जी का घर सिर्फ एक कमरे का था| शायद पूरे कॉलोनी में हर किसी का घर सिर्फ एक कमरे का है| झुग्गी-झोपडियों में दो या तीन कमरों कि जगह नहीं होती| 

दिलीप जी सो रहे थे| उनके घर के किसी सदस्य को जब मैंने उनके बारे में पुछा तो उन्होंने मुझे बुला लिया| उनकी तबियत खराब थी| फिर भी एक पत्रकार समझ कर उन्होंने मुझसे बात करना शुरू कर दिया| 

दिलीप जी से हुई बातचीत बिना किसी महत्वपूर्ण काट-छांट के प्रस्तुत है:

दिलीप प्रधान
फोटो: निहाल

निहाल: दिलीप जी, आप सब यहाँ कठपुतली कॉलोनी में कब आए? 

दिलीप प्रधान: मैं यहाँ करीब पन्द्रह-सोलह साल का था तब आया था| 

निहाल: किधर से आए थे आप लोग? 

दिलीप प्रधान: राजस्थान से| दिल्ली आने के बाद हमारे प्रोग्राम ठीक चलने लगे| तो पैंतालीस-छियालीस साल से हमलोग यहीं पर हैं| 

निहाल: पैंतालीस-छियालीस साल से... 

दिलीप प्रधान: तब से ही ये कठपुतली कॉलोनी है| ये कॉलोनी हम लोगों के नाम पर ही है| यहाँ सिर्फ जंगल ही जंगल था तब| ये जो राजेंद्र प्लेस बन है, ये तब पहाड़ी इलाका था| और ये जो रेलवे वाला पुल है ना... मेट्रो का नहीं.. रेलवे का... तब ये पुल भी नहीं था| तब हमलोग आए थे यहाँ| तब यहाँ बस एक फाटक होती थी| 

निहाल: यहाँ आने के बाद आपलोगों ने दिल्ली भर को अपनी कठपुतली कला दिखाई| दिल्ली से बाहर भी जाना हुआ? 

दिलीप प्रधान: जी हम तो विदेशों में भी गए हैं| मैं एक बार फ्रांस होकर आया था| 

निहाल: आपकी कॉलोनी में इतने कलाकार हैं, सरकार ने बिल्कुल भी कद्र नहीं की? 

दिलीप प्रधान: सरकार किसके लिए कुछ करती है? सरकार तो बस अपना पेट भरती है| बस बड़े-बड़े घोटाले करती है| किसी की भी सरकार हो कलाकारों को उनका हक नहीं देती| जिनको हम वोट देते हैं उनका काम है कि जो लोग झुग्गियों में रह रहे हैं इतने सालों से उनके बारे में कुछ सोचे| 

हमारी शुरू से डिमांड थी कि हमें प्लाट काट कर दिए जाएँ, छत हमारी अपनी हो| तो ये लोग, डी.डी.ए वाले,  कहने लगे कि कठपुतली कॉलोनी में जगह काट कर देंगे तो जगह कम है| इसलिए प्लाट काट कर नहीं दे सकते, आप दूसरी जगह चले जाओ| वहाँ हम प्लाट काट कर दे देंगे| हमने कहा कि इस जगह को छोड़ कर हम दूसरी जगह नहीं जाना चाहते| उन्होंने कहा कि थोड़े बड़े प्लाट दे देंगे| हमने कहा कि बड़े प्लाट के लिए तो हम राजस्थान चले जायेंगे| वहाँ तो बड़ी-बड़ी जगह है रहने के लिए| लेकिन वहाँ पर हमारा गुज़ारा नहीं चलेगा| वहाँ पर हमें काम नहीं मिलेगा| हमें प्रोग्राम नहीं मिलेगा| प्रोग्राम मिलेगा तभी तो हमारा गुज़ारा चलेगा| कठपुतली कॉलोनी के अंदर हमें काम मिल जाता है तो हम इसी जगह रहेंगे| 

अभी पता नहीं सरकार कि क्या प्लानिंग चल रही है| कहते हैं कि हमें बारह-बारह मंज़िल कि फ्लैट बना कर देंगे| हमारे लिए उसके अनदर रहना बहुत ही मुश्किल होगा, क्योंकि हमारी जो कला है ना वो उसके अंदर खत्म हो जाएगी... क्योंकि हमारी कठपुतली के स्टेज का सामान है... वहाँ भी तो छोटे-छोटे ही कमरे देगी... अब उसके अंदर सामान रखेंगे, हम भी रहेंगे, वहाँ प्रैक्टिस भी करेंगे, कठपुतली बनायेंगे... क्या-क्या उस छोटी सी जगह में करेंगे| तो हमें तो अपनी कला के खत्म होने का भी बहुत डर है| 

अब ये कहते हैं कि जगह कम है इसलिए चले जाओ| लेकिन हम सुनते हैं कि यहाँ पर बिल्डर मॉल बनायेंगे, और रहने के लिए घर भी बनेंगे जिसको वो बेचेंगे| अब जगह ही कम है तो बेचने के लिए कहाँ से आ गया इतना कुछ? हमारे लिए क्या कर रही है? हमारी ही ज़मीन बेच रही है| 

निहाल: मैंने जितना कुछ पढ़ा इस कॉलोनी के ऊपर तो मैंने जाना कि इसके ऊपर किसी दूसरे देश के इंसान ने एक फिल्म भी बनायी है, और इस कॉलोनी को सरकार ने रहेजा डेवेलपर्स को बेचा है, जैसा कि आपने ही कहा मॉल बनाने के लिए| और आपलोगों को आनंद पर्बत भेजा जा रहा है, जहाँ शायद बारह-तेरह माले कि बिल्डिंग बनायीं जा चुकी है....

दिलीप प्रधान: हमें तो डी.डी.ए ने कहा है आनंद पर्बत के लिए, और हमारे एम.पी अजय माकन ने भी कहा है| हमें अब एम.एल.ए भी कह रहे हैं कि तीन-चार साल लगेंगे पूरी तरह से सब कुछ बनने में| इसलिए टेमपोररी तौर पर आनंद पर्बत शिफ्ट किया जा रहा है| वहाँ पर आठ बाई दस का ही कमरा है... इससे भी छोटा (जिस कमरे में हम बैठे थे)| उसके अंदर तो रहना दुश्वार हो जाएगा| इनको कुछ तो सोचना चाहिए| आप यकीन नहीं करेंगे इन नेताओं की टोइलेट हमारे घरों से बड़ी होगी जो ये हमें रहने को दे रहे हैं| ये आप नाप कर देख लें| पता नहीं क्या सोच कर दे रहे हैं? पता नहीं ये इश्वर को या अल्लाह को मानते भी हैं या नहीं| कलाकारों को ये सूअर समझते हैं कि सामने कुछ भी डाल दिया| ऐसा लगता है जैसे पक्षी को पिंजरे में बंद कर देते हैं वैसा कुछ बना कर हमें दे रहे हैं| पता नहीं ये सरकार हमें क्या समझती है.... कि हम बाहर से कोई शरणार्थी बन कर आए हैं| अरे हम हिंदुस्तान के नागरिक हैं| इतने साल से इसी जगह पर रहे हैं| 

एक कलाकार की इज्जत करो| हम सभी दुनिया का मन बहलाते हैं| इतना कुछ करते हैं| जब एक कलाकार अपने रूप में आता है तो ये प्रधानमंत्री- राष्ट्रपति सब स्टेज के नीचे बैठ कर हमारे शो देखते हैं| जबकि हमेशा ये नेता स्टेज पर होते हैं और पब्लिक नीचे होती है| लेकिन कलाकार से नीचे ये लोग होते हैं| तो हमें इज्जत तो देनी चाहिए ना| ज़्यादा तो नहीं मांग रहें हम, बस खुश रखना चाहिए हमें|


निहाल: दिलीप सर, यहाँ आपसे छोटे बहुत लोग होंगे| आपके बच्चे भी होंगे| तो क्या अब भी ये सभी लोग कठपुतली की कला करते हैं? 

दिलीप प्रधान: जब शुरू-शुरू में हम यहाँ आए थे तो हम भूखे रह गए थे लेकिन हमने अपनी कला जिंदा रखी| अब बहुत दिन तक हमें अगर शो नहीं मिला तो हम अपनी कला को खत्म तो नहीं कर देंगे| इसी से तो हमारी पहचान है| हमें कलाकार कहा जाता है| उसे हम कैसे छोड़ दें? हमने किसी स्कूल में पढ़ाई नहीं की| हमारी पढ़ाई हमारी कला ही है| 

निहाल: तो जो नए लोग हैं उनमे आप वही जज्बा देखते हैं कला को जिंदा रखने के लिए? 

दिलीप प्रधान: कला को जिंदा रखने के लिए तो है लेकिन सरकार भी तो हमारी हेल्प करे| कम से कम एक थियेटर बना कर दे जिसमे बच्चों की प्रैक्टिस चलती रहे| अब आनंद पर्बत पर जो जगह बना कर दे दी वहाँ पर भगवान ना करे, लेकिन किसी के घर अगर कोई मर भी जाता है तो दस-बीस लोग खड़े भी नहीं हो सकते| तो कलाकारी दिखाने के लिए कहाँ जगह मिलेगी वहाँ| 

निहाल: यहाँ हमेशा पत्रकार आते रहते हैं आपलोगों से बात करने? 

दिलीप प्रधान: हाँ| 

निहाल: आपको क्या लगता है इससे कुछ फर्क पड़ेगा? 

दिलीप प्रधान: भाईसाहब, आप बुरा मत मानना| लेकिन कुछ तो ऐसे पत्रकार भी आ रहे हैं जो बाते हैं बात करते हैं और पता नहीं बाहर जाकर क्या करते हैं| एक आया था तहलका वाला| मैंने पुछा किस अखबार में लिखते हो तो बोला कि अखबार में नहीं लिखता| मेरे और कुछ लोगों के इंटरव्यू भी लेकर गया| बाद में अमेरिका से एक प्रोफेसर आए थे| उनको मैंने बताया कि तहलका वाला आया था| वो अपना नम्बर भी देकर गया था| प्रोफेसर ने फोन करके बात किया| जब बताया कि हमारे यहाँ से फोन है तो उसने फोन काट दी और दुबारा उठाया भी नहीं| उसके वेबसाइट पर भी कुछ नहीं था प्रोफेसर ने बताया| आप बुरा मत मानना| 

निहाल: अरे बुरा क्यों मानूँगा| मैं भी कलाकार हूँ| एक्टिंग करता हूँ| 

दिलीप प्रधान: अच्छा| पता है क्या आप पढ़े लिखे हो| हम लोगों से अच्छा काम कर भी लोगे... 

निहाल: अरे कभी नहीं... आपलोग तो इतने साल से कर रहे हो.. 

दिलीप प्रधान: नहीं| आप हमसे अच्छा कर भी लोगे| लेकिन आप खानदानी कलाकार तो नहीं हैं ना| आपने सीखा होगा दूसरे लोगों को देख कर| आप किसको देख कर कला कर रहे हैं? 

निहाल: दूसरे लोगों को देख कर, साथ काम कर के... 

दिलीप प्रधान: कलाकारों को देख कर ही ना? अगर ट्रेडीशनल कलाकार नहीं होते तो आज के दिन दुनिया में फिल्में नहीं बनती| आज जो बड़े-बड़े सर्कस हैं, अगर ये कलंदर ना होते, ये भालू-बन्दर वाले- तो ये सर्कस कहाँ से बनाते? अब बड़े-बड़े फिल्म वाले कहते हैं कि वो भांड-बहरूपिये वाला काम करते हैं| हम ही तो भांड-बहरूपिये हैं| और कौन है? हमें देख कर वो कर रहे हैं, लेकिन हमसे अच्छा कर रहे हैं| जिस कला को हमने जिंदा रखा है सदियों से, उन कलाकारों कि सरकार वैल्यू नहीं कर रही| 

हमलोग पीछे रह गए, इसलिए कि हमलोग पढ़ाई-लिखाई की तरफ ध्यान नहीं दे पाए| 

निहाल: अब जो छोटे बच्चे है उन्हें पढ़ा रहे हैं? 

दिलीप प्रधान: हाँ हाँ| अब पढ़ाना शुरू कर दिया है| 

निहाल: आपको क्या लगता है, ये जो बच्चे हैं जब बड़े हो जायेंगे तो कठपुतली कला करेंगे? 

कॉलोनी का एक दृश्य
फोटो: निहाल
दिलीप प्रधान: जबतक हमलोग जिंदा हैं तब तक तो खत्म नहीं होने देंगे| आगे बच्चों के बारे में क्या कह सकते हैं| लेकिन अब भी बहुत से छोटे-छोटे बच्चे हैं जो कठपुतलियाँ नचा रहे हैं| 

निहाल: और यहाँ पर जादूगर भी हैं? 

दिलीप प्रधान: हाँ| 

निहाल: वो अलग होते हैं क्या? 

दिलीप प्रधान: ऐसा है कि जो हमारी समिति हैं, “भूले-बिसरे कलाकार सहकारी समिति”, ये बारह्पाल की समिति है| बारहपाल मतलब इसमें बारह कौम है| जिसमे हिंदू भी हैं, मुसलमान भी हैं| अब जैसे कठपुतली हैं, ये बजानिया नट हैं| एक नट होते हैं| एक एक्रोबैट वाले होते हैं, जैसे भोपा हैं| जग्लर हैं| ये हिंदू होते हैं| लांगा हैं, कलंदर हैं भालू-बन्दर वाले| एक मैजिक शो वाले हैं| ये मुसलमान हैं| तो ये ट्रेडिशनल कलाकारों की एक समिति बनी है| पहले हम अलग-अलग शहरों में घूमते थे| जब यहाँ पर रहने लगे तो हम कलाकारों के एक दोस्त हैं, राजीव सेठी, उन्होंने कहा कि आप सभी ट्रेडिशनल कलाकार हो, खानदानी कलाकार हो, तो आप सभी एकता बनाओ| उस एकता के लिए एक समिति बनाओ| वो हमारी समिति के सलाहकार भी हैं| उन्होंने कई जगह अच्छे-अच्छे स्टेजों पर हमारे प्रोग्राम भी करवाये| विदेशों से भी लोग आए देखने के लिए| उनको हमारे शो पसंद आए तो उन्होंने अपने देश में बुलाना शुरू कर दिया| इसलिए यहाँ से लोग विदेशों में भी जाते हैं| 

निहाल: चलिए, उम्मीद करते हैं कि इसी तरह से सब कुछ और बेहतर होता रहे... 

दिलीप प्रधान: उम्मीद का तो क्या है... जहाँ इन लोगों ने फ़ाइनल कर दिया कि बारह मंज़िल में रखेंगे... जहाँ बेदर्द हाकिम हो वहाँ फ़रियाद क्या करना... 

हमने भी मान लिया कि जो ये दे देंगे उसी में गुज़ारा कर लेंगे| लेकिन उसमे भी हमने कुछ शर्त रखी कि आप जो सर्वे कर रहे हो उसकी लिस्ट हमें दे दो ताकि उसके अंदर हम देखें कि हममे से कोई छूट तो नहीं रहा है| उन्होंने नहीं दिया| हमने आर.टी.आई लगाया| आप जैसे ही किसी पढ़े-लिखे समझदार इंसान ने हमें बताया था| उसका जवाब नहीं दिया| दुबारा लगाया, तीन बार लगाया... एक बार भी जवाब नहीं दिया| लेकिन अब उन्होंने एक लिस्ट दिया है| पर उनके पास दो लिस्ट हैं| एक लिस्ट में उन्होंने फ़ाइनल किया है कि इन लोगों को मकान मिलेगा| वो लिस्ट हमें नहीं दे रहे अब| तो हमने अजय माकन जी से भी कहा था| वो आदमी तो बहुत अच्छे हैं पर पता नहीं इसमें उनकी क्या सोच है| वो कह तो रहे हैं कि यहाँ रहने वाले सबको मकान दिलवायेंगे| इस पर मैंने कहा कि आपकी बात तो बहुत अच्छी लगी| पर अगर आप वो लिस्ट दिलवा दे तो बड़ी मेहरबानी होगी क्योंकि डी.डी.ए. वाले तो दे नहीं रहे| इसपर वो भी कह रहें हैं कि लिस्ट कि क्या ज़रूरत जब मैं बैठा हूँ यहाँ पे| इसलिए हमें थोड़ा शक है कि शायद आधे लोगों को ज़मीन नहीं मिलेगी| 

अब टी.वी पर कभी-कभी सुनते हैं कि बम्बई में एक सोसाइटी बनी थी आदर्श... उसमे सभी नेता दूसरों के मकान खा गए| अब ऐसा भी सुनने में आया है कि हमारे जो मिलिट्री के जवान जो शहीद हो गए बोर्डर पर उनकी विधवाओं को जो पैसे मिलने थे वो तक नहीं दिए| ये सोच कर हम परेशान रहते हैं कि अगर देश पर जान न्योछावर करने वालों के साथ धोखा हो सकता है तो हम तो बस कलाकार हैं| लेकिन अब किस से कहें, किस से फ़रियाद करें| एक बार हम राजीव गाँधी जी से मिले थे| उनको हमने अपना प्रोग्राम भी दिखाया था| बड़े खुश हुए थे| तो हमने एक गाना भी सुनाया था उनको कि, 

धरती पर अम्बर का साया 

पंछी तक का अपना घर है 

जग का दिल बहलाने वाला 

कलाकार खुद बेघर है... 

तो राजीव गाँधी जी ने कहा कि अगली बार तुम्हें ये गाना नहीं गाना पड़ेगा| आज अगर राजीव गाँधी होते तो.... 


(दिलीप जी का गला रूंध गया था| मैं उनके आँख में आँसू देख सकता था| मैंने आगे रिकॉर्ड करना उचित नहीं समझा|)
कलाकारों की कॉलोनी
फोटो: निहाल